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ख़ुद खोजता मुसाफ़िर हूँ ..


ग़म की राहों  पर अज़नबी सा चलकर ,
खुशियों की तलाश करता रहा हूँ  मैं | 
खोया था जिनको पहले  कभी ,
कभी उनको तो कभी  ख़ुद को तलाश करता हूँ मैं | 


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उलझन

ये राह-ए-ज़िंदगी इतनी उलझी सी क्यों है , मैं हर बार   शूरू करता  हूँ चलना और हर बार खो जाता  हूँ ।क्या पूँछू मैं ज़िन्दगी पता तेरा, ना जाने क्यों मैं पा कर भी तुमको, खोजने हर बार निकल जाता हूँ ।ऐ ज़िन्दगी कभी पाया था मैंने भी खुदा को तेरी राहों में, मगर संभाल लेता मैं अपने खुदा को ,इतना हुनर कहाँ जानता हूँ।क्या विडंबना है  ऐ मेरी किस्मत ,थी उम्मीद जिनसे वफ़ा की ,बेवफ़ाई वो और वफ़ा करना सिर्फ मैं जानता  हूँ।कभी  ज़िन्दगी के  लिये मैं पूरे जहान  से लड़ गया था ,
आज हर बार दुआ में ,लिए हाथ मे कफन , मौत मैं माँगता हूँ ।

माँ

तेरे चरणों को छूकर ,
यूँ तुझसे लिपट कर ,
इतने वर्षों के बाद भी मैं, फिर से बच्चा बन जाता हूँ माँ।तेरे आँचल की छाया पा कर ,
तेरे गोद की माया पा कर ,
छोड़ छाड़ कर सबकुछ मैं, फिर से अच्छा बन जाता हूँ  माँ।गुज़र कर सारी ऊपर नीचे की बस्ती से भी ,
काले सागर मे अपनी ही टूटी कश्ती से भी ,
तेरे लिए दुनिया में हर बार मैं, सबसे सच्चा बन जाता हूँ माँ ।हर किसी की नफरत के बाद भी ,
खुद मेरी कुछ काली हसरत के बाद भी ,
पाकर तेरी ममता की छाया मैं, फिर से अच्छा बन जाता हूँ माँ।कैसे देखूँ तेरे आँशु जो मेरे मोती हैं ,
मेरी  लिये जो तू रात भर नहीं सोती है ,
लहू की एक बूद पर ही मैं, दुआओं से लिपटा  गुच्छा बन जाता हूँ माँ ।मैं रोता हूँ तो तुम तो  भी रोती है,
मेरे आशुओं से अपना पल्लु भिगोती है ,
मत हो परेशान तू, तेरे लिए फिर से मैं अच्छा बन जाता हूँ माँ।

किसी ने पूछा...

किसी ने पूछा मुझसे ख़ुदा देखा है तुमने ,
मैंने कहा,
जिसका चेहरा मेरी बन्द पलकों पर हर बार यु ही उभर आता है ,
जिसके  पास होने भर से जिंदा होने का  एहसास फिर से हो जाता है ,
वो मेरे लिए ,
ख़ुद खुदा से कम तो नही है । जिसकी जरूरत  दिल के हर बार धड़कने पर सांसों सी महसूस होती है ,
हर सफर में ना ही सही ,मगर हर मंजिल पर जिसकी  जरूरत होती है,
वो मेरे लिए ,
ख़ुद खुदा से कम तो नही है ।